पैड मैन’ समेत 8 बॉलीवुड फ़िल्में जिन्होंने संकुचित सोच पर किया प्रहार

पैड मैन’ समेत 8 बॉलीवुड फ़िल्में जिन्होंने संकुचित सोच पर किया प्रहार

MUMBAI【BIHTA NEWS24×7】: बॉलीवुड फ़िल्में सिर्फ़ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि कई बार कहानियां समाज को आईना दिखाने का काम भी करती हैं। अलग-अलग दौर में ऐसी कहानियां और मुद्दे पर्दे पर आते रहे हैं, जिनको लेकर समाज में एक नकारात्मक सोच या पूर्वाग्रह रहता है। फ़िल्मों के ज़रिए ऐसी सोच पर प्रहार किया जाता रहा है।

9 फरवरी को रिलीज़ हुई अक्षय कुमार की फ़िल्म पैड मैन ऐसी ही फ़िल्म है जो एक बेहद अहम मुद्दे पर बात करती है। पीरियड्स या मासिक धर्म एक ऐसा विषय है, जिस पर कभी चर्चा नहीं की जाती। जानकारी के अभाव में लड़कियां और महिलाएं माहवारी को लेकर तमाम तरह की भ्रांतियों और अंधविश्वासों का शिकार रहती हैं। शर्म, झिझक या संकोच के चलते बेटियां मां से और मांएं किसी दूसरी महिला तक से कुछ कह नहीं पातीं। सैनिटरी पैड्स का इस्तेमाल कहीं संकोच तो कहीं अनुपलब्धता की वजह से नहीं हो पाता। मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता ना रहने से नतीजा तरह-तरह की शारीरिक दिक्कतों और संक्रमण के रूप में सामने आता है।

पैड मैन इसी विषय पर बिना किसी संकोच के बात करती है। ख़ास बात ये है कि फ़िल्म का नायक एक पुरुष है, जो महिलाओं के इस अहम मुद्दे पर बात करता है। फ़िल्म में राधिका आप्टे और सोनम कपूर भी हैं। आर बाल्की ने इसे डायरेक्ट किया है। 2017 में आयी अक्षय कुमार की टॉयलेट एक प्रेम कथा में शौचालयों को लेकर बड़े-बूढ़ों की दकियानूसी सोच पर चोट की गयी थी। फ़िल्म में भूमि पेडनकर ने अक्षय की पत्नी का किरदार प्ले किया था, जो घर में टॉयलेट बनवाने के लिए एक जंग छेड़ देती है। फ़िल्म को श्रीनारायण सिंह ने डायरेक्ट किया था।

2017 में आयी आरएस प्रसन्ना निर्देशित फ़िल्म ‘शुभ मंगल सावधान’ मेल इंफ़र्टिलिटी यानि पुरुषों में नपुंसकता के विषय पर आधारित थी। मेल इंफ़र्टिलिटी को समाज में अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता और बीमारी से ज़्यादा इसे कमज़ोरी के तौर पर देखा और समझा जाता है। इसी मुद्दे पर ‘शुभ मंगल सावधान’ ने बात की। आयुष्मान खुराना और भूमि पेडनेकर ने लीड रोल्स निभाए। एक्टर श्रेयस तलपड़े ने ‘पोस्टर बॉयज़’ से डायरेक्टोरियल करियर शुरू किया। इस फ़िल्म में सनी देओल और बॉबी देओल लीड रोल्स में नज़र आए। फ़िल्म की कहानी नसबंदी को लेकर समाज में फैली भ्रांतियों पर आधारित है।

अलंकृता श्रीवास्तव की फ़िल्म ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्क़ा’ उम्रदराज़ महिलाओं की सेक्सुअल लाइफ़ को लेकर समाज में फैले पूर्वाग्रहों को दर्शाती है। फ़िल्म में रत्ना पाठक के किरदार के ज़रिए इस इशू को हाइलाइट किया गया। शुजित सरकार की डायरेक्टोरियल फ़िल्म ‘विक्की डोनर’ में स्पर्म डोनर जैसे अहम इशू के बारे में बात की गयी थी, जिसकी चर्चा करना आम ज़िंदगी में लगभग वर्जित समझा जाता है। हिंदी सिनेमा में इस सब्जेक्ट को इससे पहले कभी नहीं उठाया गया। आयुष्मान खुराना और यामी गौतम ने फ़िल्म में लीड रोल्स निभाये।

रेवती डायरेक्टेड फ़िल्म ‘फिर मिलेंगे’ में एड्स को लेकर सामाजिक सोच पर चोट की गयी। फ़िल्म में शिल्पा शेट्टी ने लीड रोल निभाया था, जबकि सलमान ख़ान ने गेस्ट एपीयरेंस किया और अभिषेक बच्चन ने अहम किरदार निभाया। ओनीर की फ़िल्म ‘माय ब्रदर निखिल’ में भी एचआईवी संक्रमण की वजह से होने वाली सामाजिक दिक्कतों को उठाया गया। फ़िल्म में संजय सूरी और जूही चावला लीड रोल्स में थे।

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